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Sharia Banking

अल्लाह तआला ने - ‘सूद को हराम क़रार दिया है और खरीदो फरोख्त को हलाल।’ - कुरआन

इस्लाम ने सूद को हराम क़रार देकर इंसानी जि़न्दगी से जुल्म और बेइंसाफी की एक बहुत बड़ी शक्ल को खत्म करना चाहा है और अमली ऐतेबार से दौरे जदीद में इस्लामी जि़न्दगी की तंजीमे नौ के सिलसिले में यह एक बहुत बड़ा चैलेंज है। जदीद मईशत में सूद और सूदी कारोबार काफी अहमियत इख्तियार कर चुकी है जबकि बैंकिंग का पूरा निजा़म सूद पर क़ायम है। मआशी जि़न्दगी की इस्लामी तामीरे नौ के लिए ज़रूरी है कि सूद के बगैर बैंकिंग का निज़ाम क़ायम किया जाये और कामयाबी के साथ चले। अल्लाह के भरोसे और आप हज़रात के तआवुन से मारवाड़ मुस्लिम एज्यूकेशनल एण्ड वेलफेयर सोसायटी जोधपुर ने इसी हक़ीक़त को फरोग़ देने के लिए मारवाड़ शरिआ कॉ-ओपरेटिव क्रेडिट एण्ड सेविंग्स सोसायटी ली. जोधपुर को क़ायम किया है।

आर्थिक क्षेत्र में पिछली कई सदियों से, पश्चिमी सभ्यता का बोलबाला रहा है। ब्याज आधारित बैंकिंग में ‘‘डिवाइन गाइडेंस’’ (अल्लाह की रहनुमाई) से मुसलमानों को महरूम रखा गया है, पर अब सारी दुनियाँ के मुसलमान, अपने जीवन को इस्लाम के सिद्धांतों के आधार पर संवारने की कोशिश में लगे हैं। पिछले तीस वर्षों में, अल्लाह की ‘‘कंमांड’’ पर आधारित इस्लामिक बैंकिंग यानी ‘डिस्ट्रीब्यूटिव जस्टिस’ को आगे बढ़ाने का काम किया जा रहा हैं यह काम पूरी दुनियाँ में तीव्र गति से आगे बढ़ रहा है, और बढ़ता ही जायेगा। इंशाअल्लाह,

रसूलुल्लाह स.अ.व. ने इरशाद फरमाया - ‘अल्लाह तआला पाक है और वो सिर्फ पाकीज़ा माल को ही क़बूल करता है और अल्लाह तआला ने मोमिनों को भी इसी बात का हुक्म दिया है जिसका उसने अपने रसूलों को हुक्म दिया। फरमाया - ‘ऐ पैग़म्बरों, पाकीज़ा रोज़ी खाओ और नेक अमल करो।’ और मोमीनों को खिताब करते हुए उसने कहा - ‘ऐ ईमानवालो जो पाक और हलाल चीज़ें हमने तुमको बख्शी हैं, वो खाओ।’ (कुरआन व हदीस)

रसूलुल्लाह स.अ.व. ने इरशाद फरमाया - ‘कि कोई बन्दा हराम माल कमाये फिर उसमें से खुदा की राह में सदक़ा करे तो यह सदक़ा उसकी तरफ से कुबूल नहीं किया जायेगा और अगर अपनी ज़ात और घरवालों पर खर्च करेगा, तो बरकत से खाली होगा। अगर वो उसको छोड़कर मरेगा तो वो उसके जहन्नम के सफर में ज़ादे राह बनेगा।’ (मिशकात)

आप स.अ.व. ने - लानत भेजी ‘सूद खाने वाले पर, सूद खिलाने वाले पर, उसके दोनों गवाहों पर और सूद के लिखने वाले पर।’ (बुखारी व मुस्लिम)
रसूलुल्लाह स.अ.व. से पूछा गया - ‘ऐ अल्लाह के रसूल। सबसे अच्छी कमाई कौनसी है?’ आप स.अ.व. ने फ़रमाया - ‘आदमी का अपने हाथ से काम करना और वो तिजारत जिसमें ताजिर बेईमानी और झूठ से काम नहीं लेता।’ (मिशकात)

रसूलुल्लाह स.अ.व. ने इरशाद फरमाया - ‘सच्चाई के साथ मामला करने वाला अमानतदार ताजिर कि़यामत के दिन नबीयों, सिद्दीक़ों और शहीदों के साथ होगा।’ (तिरमिज़ी)

नबी-ए-करीम स.अ.व. ने इरशाद फरमाया - ‘वो शख्स जिसने खुदा की राह में जान दी है उसका हर गुनाह माफ हो जायेगा सिवाए कर्ज़ के।’ (मुस्लिम)
रसूलुल्लाह स.अ.व. ने इरशाद फरमाया - ‘बेहतरीन आदमी वो है जो बेहतरीन तरीक़े पर क़र्ज अदा करता हो।’ (मुस्लिम)
रसूल्लुल्लाह स.अ.व. ने इरशाद फरमाया - ‘मालदार कजऱ्दार का कर्ज़ अदा करने में टालमटोल करना जुल्म है।’ (बुखारी)

आप स.अ.व. ने फरमाया - ‘जो लोगों का माल बतौर क़जऱ् ले और वो नीयत उसके अदा करने की रखता है तो अल्लाह तआला उसकी तरफ से अदा कर देगा। और जिस शख्स ने माल बतौर क़र्ज़ लिया और नीयत अदा करने की नहीं रखता तो अल्लाह तआला उस शख्स को उसकी वजह से तबाह कर देगा।’ (बुखारी)

मोमिनीन को अल्लाह ने पाबंद किया है कि न तो ब्याज लो और न दो। यही नहीं इस तरह की सर्गरमी का लेखा-जोखा रखने वाला भी उतना ही जिम्मेदार माना गया है जितना ब्याज लेने वाला। आइये हलाल का व्यापार और बैंकिंग करें और शरीआ के अनुसार चले। मारवाड़ शरीआ कॉपरेटिव क्रेडिट एण्ड सेविंग्स सोसायटी ली. जोधपुर में खाता खुलवाएं और रसूलुल्लाह स.अ.व. के आधार यानी शरियत पर चलें।

इस्लामिक बैंकिंग का तरीक़ा

इस्लामिक बैंकिंग निम्न तरीक़े से होती है:-

1. मुशारकह (नफा और नुक़सान में शरीक होकर कारोबार करना)
2. मुराबाहह (किसी चीज़ को नफा लेकर बेचना)
3. इजारह (किसी चीज़ को उजरत पर देना)
4. सलम (पेशगी कीमत देकर माल बाद में लेना)
5. इस्लामिक इन्वेस्टमेंट फण्ड्स (इक्विटी फण्ड, इजारह फण्ड, कमोडिटी फण्ड, मिक्सड फण्ड)

वर्तमान में निम्न प्रोडक्ट्स उपलब्ध हैं:-

1. बचत खाता
2. मियादी जमा योजना
3. रेकरिंग डिपोजिट
4. डैली डिपोजिट
5. इक्वीटी फण्ड
6. कमोडिटी फण्ड
7. ट्रेडिंग आधारित अकाउंट

इस्लामिक बैंकिंग की ज़रूरत क्यों ?

अनब्रिडल्ड प्रोफिट मेकिंग, मोनोपोली पैदा करती है, मार्केट फोर्सेस पर कोई डिवाइन (खुदाई) इंजक्शन नहीं होता। अतः किसी भी कोड आफ कण्डक्ट जो इंसान द्वारा ही तैयार किया जाता है, होते हुए भी समाज में हराम (गै़र शरई) प्रैक्टिसेज हावी होती हैं और पूरे समाज में एक असंतुलन बनता है। पूरी आर्थिक गतिविधियाँ कुछ लोगों या कार्पोरेशन्स के हाथों में आ जाती हैं जैसे की यूरोप और अमेरिका के कुछ कार्पोरेशन्स का ग्रोस टर्नओवर अनेक देशों के जी.डी.पी. से भी ज़्यादा है, पूरे समाज का आर्थिक शोषण कुछ लोगों द्वारा किया जाता है और प्रोफिट कमाने के लिए आर्टिफिशियल डिमांड इम्मोरल तरीक़े से पैदा की जाती है।

परन्तु इस्लामिक बैंकिंग में अल्लाह तआला ने रिबा (यूजरी या ब्याज), गैम्बलिंग, होर्डिंग, डिलिंग इन अन लाफुल गुड्स या सर्विसेज, शोर्ट सेल्स और स्पेक्यूलेटिव ट्रांजेक्शन्स पर पाबन्दी लगाई गई है और यह तमाम आर्थिक गतिविधियाँ हराम करार दी गई हैं। अगर यह गतिविधियाँ न की जायें तो, आर्थिक क्षेत्र में बेलेंस रहता है, डिस्ट्रीब्यूटिव जस्टिस और इक्वालिटी ऑफ अपोरच्युनिटी होती है, जिससे समाज के हर इंसान का भला होता है। यह सब आलमाइटी (अल्लाह) के कमांड्स है और इनसे छेड़छाड़ हराम करार दी गयी है।

पिछले साल अमेरिका और यूरोप में सब प्राईम क्राइसिस के कारण जो फाइनेंशियल कोलेप्स हुआ है उसके बाद सारे वेस्टर्न कंटरीज़ को इस्लामिक बैंकिंग के सिद्धांतों की उपयोगिता समझ में आने लगी है। अमेरिका तथा यूरापे में इस्लामिक बैंकों की तीव्र गति से स्थापना हो रही है। इनमें लोगों का विश्वास बढ़ता जा रहा है और इसी कारण बैंकों के ग्राहकों की अभूतपूर्व बढ़ोतरी हो रही है।

मारवाड़ शरीआ कॉ-ऑपरेटिव क्रेडिट एण्ड सेविंग्स सोसायटी ली. जोधपुर, केन्द्रीय अधिनियम नम्बर 39 ऑफ 2002 ‘‘दी मल्टी-स्टेट कॉ-ऑपरेटिव सोसायटीज एक्ट 2002 के तहत नई दिल्ली में रजिस्टर्ड है सोसायटी का संविधान सरकार द्वारा स्वीकृत है, एवं पूरे क़ायदे क़ानून एक्ट के अनुसार हैं। इसके तमाम ओहदेदारों का शेयर होल्डर्स ने संविधान के अनुसार चुनाव किया है। एकाउंट्स का बाकायदा ऑडिट, चार्टर्ड एकाउंटेंट्स द्वारा किया जायेगा एवं पूरी पारदर्शिता के साथ बैलेंस शीट शेयर धारकों को उपलब्ध रहेगी। इसकी तमाम गतिविधियाँ औलेमा के बोर्ड की मंजूरी के बाद शरीआ आधारित बैंकिंग के अनुसार होगी एवं तमाम कार्य विधि के अनुसार सम्पन्न किये जायेंगे।

आईये हम सब मिलकर मारवाड़ शरीआ कॉ-ऑपरेटिव क्रेडिट एण्ड सेविंग्स सोसायटी ली. में भागीदारी कर इसे सफल बनायें क्योंकि यह शरीआ आधारित बैंकिंग है जो अल्लाह का हुक्म है।